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Galway krisham Product

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तौरई टिंडा एवं चप्पन कद्दू की सब्जी में लगने वाले रोग एवं उनके उपचार 

जो किसान भाई कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती के दौरान उसमें होने वाले रोगों से परेशान हैं उनके लिए हम लाए हैं गैलवे कृषम के शानदार उत्पादों की सौगात ।

 

तौर रई , टिंडा एवं चप्पन कद्दू का उपयोग प्रमुख रुप से सब्जियों में लगभग पूरे भारत बहुतयात रूप से किया जाता है । गर्मियों में बेल यानी कि कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती व्यापक रुप से की जाती है ।

 

कई बार इनकी फसलों को कीट और बीमारियां लग जाती हैं । इसकी वजह से फसलों को भारी नुकसान भी पहुंचता है । इनका प्रकोप फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता को कम कर देता है ।

 

ऐसे में कद्दूवर्गीय सब्जियों के पौधों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए । प्रमुख बीमारियां एवं उनके रोकथाम पाउडरी मिल्डयू- इस रोग के लक्षण पत्तियों एवं तनों की सतहों पर सफेद या धुंधले रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं ।

कुछ दिनों के बाद ये धब्बे चूर्णयुक्त हो जाते हैं और सफेद चूर्णित पदार्थ अंत में समूचे पौधे की सतह को ढक लेता है । इस कारण फलों का आकार छोटा रह जाता है ।

 

25 डिग्री सेंटीग्रेट के आस – पास तापमान होने पर व अधिक आर्द्रता होने पर रोग तेजी से फैलता है एन्कनोज- पानी युक्त धब्बे पत्तियों पर दिखाई देते हैं जो बाद में पीले रंग में बदल जाते हैं ये धब्बे बाद में भूरे रंग व काले रंग के हो जाते हैं ।

 

ज्यादा संक्रमण होने पर फलों पर भी भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं । 24-30 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान और अधिक आर्द्रता लंबे समय तक रहने पर फंगस वृद्धि करने लगता है । डाउनी मिल्डयू- इस रोग से पत्तियों पर कोणीय धब्बे बनते हैं ।

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ये पत्तियों के ऊपरी पृष्ठ पर पीले रंग के होते हैं । अधिक आर्द्रता होने पर पत्तियों की निचली सतह पर मृदुटोमिल कवक की वृद्धि दिखाई देती है । बरसात के मौसम के बाद 25 डिग्री सेंटीग्रेट से अधिक के तापमान पर यह रोग तेजी से फैलता है ।

 

 मोजैक- इससे पौधे की नई पत्तियों में छोटे हल्के पीले धब्बों का विकास सामान्यतः शिराओं से शुरू होता है पौधे विकृत तथा छोटे रह जाते हैं । हल्के पीले चित्तीदार लक्षण फलों पर भी उत्पन्न हो जाते हैं कीटों के द्वारा फैलता है

इसलिए कीटों का नियंत्रण करें । इसके लिए अच्छे बीजों का प्रयोग करें एवं रोगी पौधे को उखाड़कर नष्ट कर दें । रोगों का उपचार- बुआई के समय 1 लीटर जी बायो फास्फेट को 200 या 300 किग्रा . गोबर की खाद में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से मिट्टी का उपचार करें ।

रोगों के लक्षण दिखने पर 1 लीटर जी – पोटाश को 150 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें । 

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